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धधकते अंगारों पर नृत्य करेंगे जाख देवता, मंदिर में पहुंचीं कई टन लकड़ियां, बड़ा सवाल- किस पर अवतरित होंगे आज देव

केदारघाटी के आराध्य यक्षराज जाख देवता इस वर्ष किस भक्त पर अवतरित होकर धधकते अंगारों में नृत्य करेंगे, यह बड़ा सवाल आज बना हुआ है। क्योंकि देवता के पश्वा रहे मदन सिंह का कुछ समय पूर्व निधन हो चुका है। देवता के धधकते अंगारों पर नृत्य करने के दृश्य के हजारों श्रद्धालु साक्षी बनते हैं। दो दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान का देवशाल, नारायणकोटी और कोठेडा के ग्रामीणों की बैठक के साथ विधिवत शुभारंभ हो गया है।

तीनों गांवों के प्रत्येक परिवार से प्रसाद के लिए सामग्री एकत्रित करने के साथ अग्निकुंड के लिए जंगल से लकड़ियों के ढेर मंदिर में पहुंचा दिए गए हैं। जहां पर विधि-विधान से पूजा-अर्चना और वेद मंत्रोच्चार के बीच अग्निकुंड तैयार होगा। इसमें भगवान यक्षराज अपने पश्वा पर अवतरित होकर नृत्य करेंगे।

कोरोनाकाल के चलते बीते दो वर्ष जाख मेला का आयोजन सूक्ष्म रूप से किया गया था लेकिन अब हालात सामान्य होने पर इस बार मेले में श्रद्धालुओं की भारी संख्या पहुंचने की उम्मीद है। मेला आयोजन को लेकर कोठेड़ा, नारायणकोटी और देवशाल के ग्रामीणों ने संयुक्त बैठक कर आयोजन की तैयारियों पर चर्चा की। साथ ही प्रत्येक परिवार से अनुष्ठान के लिए प्रसाद तैयार करने की सामग्री भी एकत्रित की गई।बीते वर्ष काटी गई लकड़ियों को देवशाल स्थित मंदिर तक पहुंचाया गया। देवशााल गांव स्थित मां विंधवासिनी मंदिर से ढोल-दमाऊं के साथ जाख देवता की मूर्ति को सुसज्जित रिंगाल की कंडी में जाख मंदिर परिसर में लाया गया।यहां पर पूजा-अर्चना के बाद सांयकाल को विधि-विधान के साथ अग्निकुंड में अग्जि प्रज्जवलित की जाएगी। साथ ही पूरी रात चार पहर विशेष पूजा-अर्चना और अन्य धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया जाएगा।परंपरानुसार भगवान जाख देवता अपने पश्वा पर अवतरित होकर गंगा स्नान कर पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ जाख मंदिर में पहुंचेंगे। जहां पर आराध्य धधकते अग्निकुंड में नृत्य करते हैं। जाख देवता के पुजारी उत्तम भट्ट और देवशाल के मनोहर देवशाली बताते हैं कि सदियों से आराध्य केदारघाटी के रक्षक व अनावृष्टि और अतिवृष्टि से मुक्ति देने वाले देवता के रूप में पूज जाते रहे हैं।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्वयं भगवान शिव द्वारा इस लिंग को जाखधार में स्थापित करने का आदेश दिया गया था। प्रतिवर्ष यहां बैसाख माह की संक्राति को दो दिवसीय मेला शुरू होता है, जिसमें भगवान यक्षराज अपने पश्वा पर अवतरित होकर अग्निकुंड के धधकते अंगारों पर नृत्य करते हैं।

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