Breaking News
Home / Entertainment News / Rajkumar Santoshi: सबने साथ छोड़ा तब सनी देओल आए साथ, ‘केसरी’ शुरू करने से पहले करण जौहर ने फोन तक नहीं किया

Rajkumar Santoshi: सबने साथ छोड़ा तब सनी देओल आए साथ, ‘केसरी’ शुरू करने से पहले करण जौहर ने फोन तक नहीं किया

निर्माता निर्देशक राजकुमार संतोषी बड़े बड़े सितारों के साथ फिल्में बना चुके हैं। अब गणतंत्र दिवस पर वह लेकर आ रहे हैं एक अनोखी फिल्म ‘गांधी गोडसे एक युद्ध’। वह फिल्म उद्योग में स्टार सिस्टम के सख्त खिलाफ हैं। उनका मानना है कि हीरो को खुदा बना देने से ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री गर्त में जा रही है। अपनी नई फिल्म की रिलीज से पहले ‘अमर उजाला’ से उन्होंने खुलकर बात की। अपनी उस फिल्म के बारे में बताया जो अमिताभ बच्चन के साथ वह बनाने वाले थे। और, साथ ही बताया उस वक्त के बारे में जब फिल्म ‘घायल’ के निर्माता के पीछे हट जाने पर सनी देओल ने खुद उस फिल्म को बनाने का बीड़ा उठाया।

बाजीगर

संतोषी जी, किसी फिल्म का असली स्टार कौन होता है
फिल्म का विषय ही सबसे बड़ा स्टार होता है। लोग डिमांड करते है कि स्टार्स चाहिए लेकिन वे भूल जाते हैं कि स्टार्स भी कभी नए थे। यश चोपड़ा ने शाहरुख खान को सपोर्ट किया तो वह स्टार बन गया। ‘बाजीगर’ हिट हुई है तो अनु मलिक के संगीत का योगदान भूल सकते हैं क्या? उसमे काजोल का भी योगदान है, उसने भी अच्छा काम किया है। अब्बास मस्तान जिन्होंने फिल्म का निर्देशन किया, उन्होंने पूरा ड्रामा क्रिएट किया। समझना ये जरूरी है कि अगर सलमान खान ने हिट फिल्म दी है तो सिर्फ उसमें सलमान खान ही नहीं बल्कि पूरी टीम का योगदान है।विज्ञापन

कांतारा

तो क्या स्टार सिस्टम ही हिंदी सिनेमा का पतन का कारण है?
आप एक आदमी को खुदा बना देते हैं इसीलिए इंडस्ट्री का पतन हो रहा है। ‘बाहुबली’ से पहले प्रभास को कौन जानता था। ‘कांतारा’ इतनी बड़ी हिट हुई। ज्यादातर लोगों को इसके हीरो का नाम तक पता नहीं होगा। आज कंटेंट चल रहा है। अब लोग बोलेंगे कि हीरो की फिल्म थी। मैं कहूंगा कि वह उसकी फिल्म नहीं बल्कि पूरी टीम की फिल्म थी। फिल्म मेकिंग मेरी रोजी रोटी है। लेकिन ‘भगत सिंह’ और ‘गांधी गोडसे एक युद्ध’ बनाकर मुझे ऐसा लगा कि इस दुनिया और समाज से जो मैं ले रहा हूं उसके बदले में कुछ दे भी रहा हूं। युवाओं के लिए भगत सिंह जैसे वीर आदर्श होने चाहिए, ना कि गुटखा बेचने वाले ये सितारे… 

फटा पोस्टर निकला हीरो

बीच में काफी लंबा वक्त हो गया आपको फिल्म बनाए हुए?
‘अजब प्रेम की गजब कहानी’ के बाद मैं एक फिल्म ‘पॉवर’ में उलझ कर रह गया था। अमिताभ बच्चन को लेकर बना रहा था फिल्म, लेकिन नहीं बन पाई। उसी दौरान शाहिद कपूर को लेकर ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ बनाई। उन दिनों दौर यह सब शुरू हो गया था कि कारपोरेट कंपनियां पहले से तय कर लेती थीं कि फला स्टार के साथ फिल्म बनानी है और उसी के हिसाब से कहानी बनाओ। अगर मैं किसी प्रोड्यूसर के पास जाऊं तो प्रोड्यूसर यह पूछे कि राज जी क्या बनाना चाहते हो? तब तो ठीक है लेकिन कोई अगर मुझसे कहे कि किसके साथ बनाना चाहते हो तो मुझे बड़ी निराशा होती है।विज्ञापन

बैटल ऑफ सारागढ़ी

हां, सारागढ़ी भी आप बना रहे थे..
सिखों के लिए हमेशा से ही मेरे मन में बड़ी इज्जत है, हो सकता है कि किसी जन्म में मैं सिख रहा होऊंगा। जब भी कोई आपदा आती है तो सारे सिख सेवा भाव से पहुंच जाते हैं। यह फिल्म मैं नए लोगों के साथ बनाना चाह रहा था। उस फिल्म के लिए रणदीप हुड्डा से मेरी बात हुई। मैने उनको ईश्वर सिंह का रोल दिया। रणदीप बहुत ही मेहनती, अच्छा और ईमानदार एक्टर है। दो साल तक वह सरदार के गेटअप में रहा। फिल्म की शूटिंग भी हमने 20 दिनों तक की। उसी दौरान अक्षय कुमार को लेकर ‘केसरी’ शुरू हो गई। हमारी फिल्म में पैसा लगाने वाले पीछे हट गए। ‘केसरी’ के निर्माता करण जौहर को कम से कम एक बार पूछ तो लेना चाहिए था। हम एक ही इंडस्ट्री में हैं लेकिन नहीं पूछा और मैं गम खाकर रह गया।

गांधी गोडसे एक युद्ध

और, अब गांधी और गोडसे की कहानी एक साथ?
मैंने इस फिल्म में गांधी और गोडसे के विचारों को निष्पक्ष भाव से सामने रखा है। ये प्रयोग हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में पहली बार हो रहा हैं। ये व्हाट इफ जैसा है कि अगर गांधी जी गोली लगने के बाद बच गए होते तो क्या होता? अगर गांधी और गोडसे की मुलाकात हुई होती और उनके बीच बातचीत हुई होती तो क्या होता? मुझे ऐसा लगता है कि दोनों के साथ अन्याय हुआ है। गांधीजी पर खूब आरोप लगे। गोडसे पर भी आरोप लगे। उनके अदालत में दिए बयान को दबा दिया गया। मेरा मानना है कि गोडसे की आवाज को जनता तक पहुंचना चाहिए।

गांधी गोडसे एक युद्ध

‘गांधी गोडसे एक युद्ध’ असगर वजाहत के नाटक पर आधारित है, इसके अलावा भी कोई रिसर्च की आपने, इस फिल्म को लेकर?
कुछ किताबें हैं जिनमें उनके बारे में लिखा गया है कि उनकी परवरिश कैसे और कहां हुई। मेरा सवाल ये है कि अदालत में दिए गए उनके बयान को सार्वजनिक करने में 70 साल क्यों लग गए? जो भी इतिहास में हमें साक्ष्य मिले हैं, उसी के आधार पर हमने फिल्म बनाई है और दोनों के विचार दर्शकों के सामने रखने की कोशिश की है। 

सनी देओल और राजकुमार संतोषी

सनी देओल को लेकर आप ‘जिन लाहौर नहीं वेख्या’ बनाने जा रहे हैं, अब आप दोनों के रिश्ते ठीक हैं? 
कुछ चीजों को लेकर बीच में मनमुटाव था लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं रहा। वह मुझे बहुत प्यार करते हैं। दोस्त हैं हमारे। उनके साथ बहुत बड़े बजट की फिल्म बना रहे हैं। बीच में कई फिल्में बनाने की सोची लेकिन बात बन नहीं पाई। अब अच्छा वक्त आया है। ‘जिन लाहौर नहीं वेख्या’ एक नाटक पर आधारित बहुत ही बढ़िया विषय है। यह बहुत बड़े बजट की फिल्म होगी। सनी देओल को विषय बहुत पसंद आया है। जल्द ही हम इसकी आधिकारिक घोषणा करेंगे। ‘जिन लाहौर नहीं वेख्या’ नाटक को हम ‘लाहौर 1947’ के नाम से बना रहे हैं। 

घायल

अच्छा ये बताइए कि सनी देओल और आपकी दोस्ती कैसे हुई? 
मैं फिल्म ‘घायल’ की स्क्रिप्ट पूरी कर चुका था और मैंने सनी देओल को इसके लिए फोन किया। उनके सेक्रेटरी जतिन ने फोन उठाया। मेरा परिचय तब यही था कि मैं गोविंद निहलानी का चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर हूं। उन्होंने बुला लिया और कहानी सुनी। सनी देओल को कहानी पसंद आई और तय हुआ कि फिल्म बनाते हैं। तब इस फिल्म में दक्षिण के एक निर्माता पैसा लगा रहे थे। सनी देओल की फिल्में उन दिनों चल नहीं रही थीं तो वह इस फिल्म में संजय दत्त या किसी दूसरे सितारे को लेना चाहते थे। सनी देओल के साथ काम शुरू हुआ तो वह पीछे हट गए। मैंने बिना सनी देओल फिल्म बनाने से मना कर दिया। इसके बाद सनी देओल ने खुद ये फिल्म प्रोड्यूस की और उसके बाद क्या हुआ, सब जानते ही हैं।

23 मार्च 1931 शहीद

और, आप दोनों का मतभेद हुआ भगत सिंह पर बनी फिल्म को लेकर
जब मैं ‘लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ बना रहा था तो सनी देओल ने ही सबसे पहले मुझसे कहानी सुनी थी। उनको शायद ये लगा कि ये फिल्म मैं बॉबी देओल के साथ ही बनाऊंगा। फिर उन्होंने खुद इसी विषय पर फिल्म शुरू कर दी जोकि उनका गलत फैसला था। इसकी वजह से उन्हें काफी नुकसान भी हुआ। मेरी फिल्म को तो नेशनल अवार्ड और फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला था।

गांधी गोडसे एक युद्ध

एक तरफ भगत सिंह और दूसरी तरफ गांधी। दो विपरीत ध्रुवों को साधने के पीछे की मंशा क्या रही आपकी? 
‘पुकार’ की शूटिंग करते समय एक लाइब्रेरी में मुझे भगत सिंह की किताब मिली। भगत सिंह अपने आप में एक युग हैं। उसी दिन मुझे लगा कि इस पर फिल्म बनानी चाहिए। युवाओं के लिए भगत सिंह आदर्श होने चाहिए। युवाओं को भगत सिंह की टी शर्ट पहनकर घूमना चाहिए। देश के वीर सिपाही ही हमारे आदर्श होने चाहिए न कि गुटखा बेचने वाले स्टार।

अंदाज अपना अपना

और ‘अंदाज अपना अपना’ की सीक्वल की क्या कहानी है? हर साल दो साल में इसकी हवा बहती रहती है? 
हां, कई लोगों ने कोशिश की इसे बनाने की लेकिन कानूनन वह इसे बना नहीं सकते हैं। उस फिल्म के सारे किरदार मैने क्रिएट किए हैं। ‘अंदाज अपना अपना’ की दुनिया मेरी रची हुई है। कोई इसे बनाने की हिम्मत करेगा नहीं क्योंकि किसी के पास इसके अधिकार नहीं है। सच पूछिए तो मैं खुद भी इसे नहीं बनाना चाहता हूं। मेरा मानना है कि एक बार जो चीज बन चुकी है उसमें दोबारा हाथ नहीं लगाना चाहिए। उसी तरह की एक रोमांटिक कॉमेडी मैंने लिखी है लेकिन उसकी अपनी एक अलग दुनिया है। इसका एलान मैं दिवाली के आसपास करूंगा।

Check Also

Thalapathy 67: ‘वारिसु’ के बाद ‘थलपति 67’ के साथ बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाने आ रहे विजय, जानिए कब होगी रिलीज

साउथ के सुपरस्टार विजय इन दिनों अपनी फिल्म ‘वारिसु’ को लेकर सुर्खियों में छाए हुए …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *